Tuesday, October 13, 2015

ऐसे  ही बैठे थे कुछ सपनों के साथ, ठंडी हवा नाच रही थी, आते जाते लिपट के अपना अहसास करा रही थी. शायद जानना चाह रही थी कि सपने क्या बुदबुदा रहे हैं. लग रहा था सपने सच हो रहे हैं. 
भूल गये थे कि वक़्त नाराज़ चल रहा है, आजकल अपने आप को ठगा सा महसूस कर रहा है. वो जानता है उसके सामने मेरा वजूद कुछ नहीं फिर भी ख़फ़ा है. 
तभी एक झटका लगा दिल को , सपने टूट गये थे. एक क्षण में वक़्त ने मेरी औक़ात बता दी. टूटे सपने आँखों से आँसू बनके निकल रहे थे. अब तो हवा भी खिसक ली थी. 

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